एकता और सहिष्णुता व्यावहारिक अनिवार्यताएं हैं: इंदिरा गाँधी

अगर कोई किसी एक प्रकार की साम्प्रदायिकता का पक्ष लेता है तो वह जिस अनुपात में ऐसा करता है उसी अनुपात में वह और संकीर्ण बनती जाती है।

“बुनियादी तौर पर एकता कोई आदर्श नहीं है। सहिष्णुता भी कोई आदर्श नहीं है। ये तो आज के भारत की, बल्कि मैं कहूँगी कि आज के विश्व की व्यावहारिक अनिवार्यताएं हैं। भारत में, अनेक सम्प्रदाय हैं, अनेक धर्म हैं, अनेक जातियां हैं। हमने देखा है कि अगर कोई किसी एक प्रकार की साम्प्रदायिकता का पक्ष लेता है तो वह जिस अनुपात में ऐसा करता है उसी अनुपात में वह और संकीर्ण बनती जाती है। इस अर्थ में मैं कह सकती हूं कि मुझे बहुत-सी नई जानकारी मिल रही है जिसके बारे में मैंने कभी भी पहले नहीं सुना था, जैसे बड़ी संख्या में उप-जातियां और उप-विभाग आदि जो भारत के प्रायः प्रत्येक धर्म के अंतर्गत पाए जाते हैं। हम ऐसे संकीर्ण दायरे में जितना ही सोच-विचार करते हैं, जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण उतना ही और संकीर्ण होता जाता है। काम करने और सोच-विचार करने की हमारी शक्ति और सीमित होती जाती है और इसलिए प्रगति या विकास के लिए अवसर भी और संकुचित होते जाते हैं।”

 

(राष्ट्रीय एकता परिषद, 11/06/1973, नई दिल्ली)