राजनीति जहाँ वह कठोर होती है, वहाँ वह तानाशाही समझी जाती है: दिनकर

राजनीतिक नेताओं की यह आदत होती है कि सभा के मंचों से वे चाणक्य और मैकियावेली की निंदा करते हैं, मगर जब वे दफ्तर की मेज पर होते हैं, चाणक्य और मैकियावेली का थोड़ा अभ्यास किए बिना उनका काम नहीं चलता। पंडित जी इस नियम के अपवाद थे।

nehru dinkar

‘लोकदेव नेहरू’ में दिनकर लिखते हैं-

राजनीति की परिभाषा आसान नहीं है। राजनीति युद्ध भी है और शान्ति भी, हिंसा भी है और अहिंसा भी, सिधाई भी है और छल-प्रपंच भी। युद्ध राजनीति की उस अवस्था को कहते हैं, जब वह लोहू से लाल हो उठती है।

 


राजनीति जहाँ कोमल होती है, वहाँ उसे प्रजातंत्र कहते हैं। जहाँ वह कठोर होती है, वहाँ वह तानाशाही समझी जाती है। मगर ऐसा नहीं है कि जहाँ प्रजातंत्र है, वहाँ तानाशाही की कोई भी प्रवृत्ति नहीं चलती हो। इंग्लैंड और अमरीका की राजनीति भी वोट तो सबसे लेती है, मगर अपने असली रहस्य का सूत्र कुछ चुने हुए लोगों के ही हाथों में रखती है। और रूस तथा चीन की निन्दा हम चाहे जितनी भी कर लें, मगर वहाँ की राजनीति भी जनता का मुँह जोहे बिना नहीं चल सकती।


दिनकर आगे लिखते हैं-

प्रजातंत्र और तानाशाही के बीच एक विभाजक रेखा जरूर है। मगर उस रेखा पर पाँव रखने की विवशता या लोभ सभी राजनीतिज्ञों को होता है। तानाशाह इस रेखा को इसलिए लाँघता है कि जिस आदमी की वह गरदन पकड़े हुए है, उसके हृदय को भी वह जरा गुदगुदाना चाहता है। और प्रजातंत्री नेता इस रेखा पर इसलिए पाँव धरता है कि जिनके वोटों के बल पर वह राजा बना है, उन्हें अपनी इच्छित दिशा की ओर थोड़ा मोड़ सके।

 

राजनीतिक नेताओं की यह आदत होती है कि सभा के मंचों से वे चाणक्य और मैकियावेली की निंदा करते हैं, मगर जब वे दफ्तर की मेज पर होते हैं, चाणक्य और मैकियावेली का थोड़ा अभ्यास किए बिना उनका काम नहीं चलता। पंडित जी इस नियम के अपवाद थे।

 

-रामधारी सिंह ‘दिनकर’

(लोकदेव नेहरू)

https://thelucknowpost.com/how-far-have-we-fallen-from-the-ideals-that-bapu-laid-before-us-jawaharlal-nehru/4453