“आइए, हम सब वृहत्तर हित के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा दें।”: इंदिरा गाँधी

संकीर्ण क्षेत्रवाद,भाषाई विद्वेष का दीर्घकालीन समाधान संतुलित विकास के जरिए ही हो सकता है

आज जिस पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न राज्यों के विधायक कॉंग्रेस छोड़ छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी या TMC जैसे अन्य दलों में शामिल होते जा रहे हैं, उसी कॉंग्रेस ने पूर्वोत्तर में विकास की नींव रखी थी। लगातार उपेक्षा का शिकार रहे उत्तर पूर्वी भारत के राज्यों के समुचित विकास व रणनीतिक सामंजस्य के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 7 नवंबर  1972 को ‘पूर्वोत्तर परिषद’ का शिलांग में उद्घाटन किया।

इमरजेन्सी लगाने के लिए विपक्षियों और बुद्धिजीवियों के निशाने पर आजतक रहने वाली श्रीमती गाँधी ने परिषद का उद्घाटन करते हुए कहा था


“कुछ दिन पूर्व मैं संसद में विपक्षी दलों के सांसदों से मिली थी। वे सभी सहमत थे कि हमें असम में हमें सामान्य वातावरण बनाने के लिए काम करना चाहिए और शांतिपूर्ण विचार-विमर्श के द्वारा राज्य की वास्तविक कठिनाइयों को दूर करना चाहिए।”


इंदिरा गाँधी ने अपनी प्रचलित छवि के विपरीत विपक्ष के नेताओं  से सदन में और सदन के बाहर हमेशा संवाद बनाए रखा विशेषतया तब तो अवश्य जब मुद्दा देश के विकास और एकता एवं अखंडता से जुड़ा हो।

सभी नेताओं और नागरिकों से आह्वाहन करते हुए उन्होंने कहा –


“एक न्यायप्रिय समाज में कुछ लोगों के अधिकार को अन्य लोगों के अधिकारों पर हावी नहीं होना चाहिए।भारत में हम सब राष्ट्र के पुनर्निर्माण के महान कार्य में संलग्न हैं और अपने इतिहास को एक नई दिशा देना चाह रहे हैं।इसमें सभी क्षेत्रों की जनता सहभागी है। आइए, हम सब वृहत्तर हित के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा दें।”


समाज में तनाव को कम करने के लिए रोजगार की वकालत करने वाली इंदिरा गाँधी का मानना था कि “संकीर्ण क्षेत्रवाद,भाषाई विद्वेष का दीर्घकालीन समाधान संतुलित विकास के जरिए ही हो सकता है।”

काश! आज की सरकार भी ‘विकास’ को ऐसे ही समझती।