भारत विभाजन: अंग्रेज़ी कुटिलता या हिंदू-मुस्लिम धर्मांधता?

विभाजन को ही ‘आज़ादी’ समझ बैठने की भूल की क़ीमत चुकाने के लिए भारत पाकिस्तान सहित सम्पूर्ण भारतीय उप-महाद्वीप आज तक अभिशप्त है।

मुस्लिम लीग के नेताओं की परिकल्पना यह थी कि पाकिस्तान मुख्यतः एक मुस्लिम बाहुल्य देश होगा जिसे हिन्दुस्तान का हर मुस्लिम अपना समर्थन देगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि भारत के समस्त मुसलमानों ने इसके गठन का समर्थन नहीं किया।



बंटवारा चाहे एक घर का हो या एक मुल्क का, उसके दर्द को क्या संख्याओं में बयां किया जा सकता है? हिंदुस्तान के विभाजन की एक बानगी संख्याओं में कुछ यूं कही जा सकती है – 40 करोड़ की आबादी और 3500 किमी से अधिक के विभाजन के लिए मात्र 40 दिनों में रैडक्लिफ़ लाइन निर्धारित हुई, एक करोड़ से अधिक जानें गईं, एक से दो करोड़ लोग बेघर हुए, क़रीब 1 लाख महिलाओं का अपहरण, दुष्कर्म और हत्या, 1.5 करोड़ लोगों ने पैदल यात्रा कर के मुल्क बदले, और 3 लाख किमी से अधिक ट्रेनें चलीं दोनों मुल्कों के बीच सिर्फ़ 1947-48 में और नई सरहद के दोनों तरफ़ असंख्य रिफ्यूजी/शरणार्थी कैंप।

मानव इतिहास का आज तक का सबसे बड़ा पलायन

आंकड़ों के अलावा तथ्य भी उस दौर की वीभत्स्ता को बयां करते हैं – कश्मीर मसला, पंजाब सूबे की मांग, हिंदू-मुस्लिम के बीच अंतहीन वैमनस्यता, दोनों मुल्कों के बीच 3 युद्ध, हिंदुस्तान में मुसलमानों और पाकिस्तान में हिंदुओ/सिखों पर अनगिनत अत्याचार और हज़ारों परिवार जो बिछड़े और आज तक अपने ज़िंदा पुरखों से मिल नहीं सके।

सैकड़ों सालों से आपस में इंसानों की तरह रहती 3 कौमें – हिन्दू, मुस्लिम और सिख – कब कैसे जानवर बन जाएंगी इसका अंदेशा रैडक्लिफ़ की टीम और हिंदुस्तान के तत्कालीन नेताओं को भी नहीं था। 1906 में बनी मुस्लिम लीग ने कई दशकों तक पाकिस्तान की परिकल्पना नहीं की थी बल्कि वह ख़ुद को हिंदुस्तान के मुसलमानों और उनकी बेहतरी का नुमाइंदा मानती थी। पर 1940 तक वक़्त बदल चुका था जब जिन्ना ने पहली बार पाकिस्तान का प्रस्ताव रखा। गांधी, पटेल और नेहरू की तमाम कोशिशें जिन्ना की धार्मिक असुरक्षा को डिगा नहीं पाईं। 1947 फरवरी में इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री एटली ने 1948 में भारत छोड़ देने की बात कही लेकिन फ़िर तय तारीख़ से 10 महीने पहले ही 1947 जून में ही उनके नुमाइंदे मॉउन्टबेटन ने जिन्ना समेत अन्य नेताओं के सामने विभाजन का मसौदा रखा। चंद हफ़्तों के अंदर नक्शों पर ऐसे कुछ शख्सों ने रेखाएं खींची जिन्हें भारत की विशालता और विभिन्नता का कोई इल्म नहीं था। और इल्म भी किस क़दर नहीं था उसकी एक बानगी देखिये:

 

विभाजन की घोषणा के बाद एक पत्रकार ने माउंटबेटन से पूछा “क्या आप जनसंख्या के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण की उम्मीद करते हैं?”, जिसके जवाब में माउंटबेटन ने कहा “व्यक्तिगत रूप से, मैं इसे नहीं देखता, और यह मामला दोनों सरकारों के हुक्मरानों से ज़्यादा सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले स्थानीय अधिकारियों का है जिनकी भूमिका शांति बनाये रखने की होगी।”

 

और इतिहास अब गवाह है कि स्थानीय अधिकारियों हों या दोनों सरकारें, कोई कुछ नहीं कर पाया और 2 महीनों के अंदर अंग्रेज़ तो चले गए लेकिन आज़ादी के नाम पर छोड़ गए करोड़ों लाशें और बेघर और बेइंतहा नफ़रत जो आज कुछ और ही रूप ले चुकी है।

विभाजन के कारण कई हैं, उस कहानी के किरदार कई हैं। इस पैमाने पर हुई घटना के लिए किसी भी एक शख्स या समूह को सिरे से जिम्मेदार मान लेना उस दौर के बारे में हमारी बेहद कम समझ को दर्शाता है। विभाजन एक त्रासदी है जिस के छींटे सब पर हैं अगर हमारी धार्मिक असुरक्षाएं हमें देखने दें तो। इस लेख से मेरी कोशिश उस त्रासदी से उपजे उन गहरे ज़ख्मों के बारे में कहना है जो अब शायद कभी नहीं भरेंगे। ख़ास कर उन वजहों को समझना जिन्होंने कुछ दिनों, हफ़्तों और महीनों तक इंसानों के अंदर से इंसानियत दफ़न कर दी थी। यह आपसी नरसंहार अप्रत्याशित और अभूतपूर्व दोनों था।

मेरा यह बहुत विश्वास से मानना है कि विभाजन के वक़्त हिन्दुस्तान और पाकिस्तान जैसे और कोई दो देश नहीं थे जो इतना मिलते जुलते हों – धार्मिक विभिन्नता हो या त्यौहार, भाषा हो या खाना। आख़िर यह था तो पूरा एक “Indian subcontinent/भारतीय उपमहाद्वीप” ही। लेकिन धार्मिक आधार पर हुए विभाजन ने मौजूद अंतरों को खाई में बदल दिया।


झटपट हुए विभाजन की प्रतिक्रिया भी तीव्र हिंसक ही थी जिसे समझना आसान नहीं है – जिसमें इंसानी जज़्बातों और असुरक्षाओं की कई परतें शामिल हैं। मसला शायद सिर्फ़ धार्मिक नहीं था, क्षेत्रीय भी था। पंजाब और बंगाल के लाखों इलाकों और परिवारों से जब रैडक्लिफ़ लाइन गुज़री तो तनाव, भविष्य को लेकर भ्रम, जर और ज़मीन के खो जाने के डर स्वाभाविक थे। पंजाब में स्थिति विशेष रूप से खतरनाक थी, जहां हथियार और द्वितीय विश्व युद्ध से रिटायर्ड सैनिक प्रचुर मात्रा में थे। नई सरहद के दोनों तरफ़ अगर ऐसे लोग थे जो अपने आस पास “अल्पसंख्यक” नहीं चाहते थे तो ऐसे भी थे जो ख़ुद नए मुल्कों में बतौर “अल्पसंख्यक” अपनी पहचान नहीं चाहते थे।


मैं समझता हूँ कि वह नस्लीय हिंसा असल में अचानक नहींथी। उसके बीज अंग्रेज़ी हुकूमत ने बहुत पहले से बोने शुरू कर दिए थे। जैसे एक परिवार के दो सदस्यों में तक़रार और मन मुटाव स्वाभाविक होते हैं वैसा ही कुछ हिन्दू-मुसलमानों के बीच भी था। फ़र्क़ थे, मतभेद थे। पर 1946-1948 जैसी खूनी वैमनस्यता नहीं थी। वह ब्रिटिश खुराफातें ही थीं जिन्होंने धार्मिक पहचान के आधार पर संप्रदायों को परिभाषित करना और उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना शुरू किया। कई सालों तक चले इस “ब्रेन वाश” से पैदा हुई धार्मिक असुरक्षाओं ने आम भारतीयों के मन में यह सवाल पैदा कर दिया कि वे किस “तरफ़” हैं। साथ ही, धार्मिक असुरक्षाओं को भुनाने की कोशिशें सिर्फ़ मुस्लिम लीग के संदर्भ में नहीं थी, बल्कि यह हिंदू महासभा और पंजाब सूबे के संदर्भ में भी थी।

बाँटो और राज करो ?

ब्रिटिश इतिहासकार यास्मीन खान कहती हैं कि विभाजन “ब्रिटिश साम्राज्य की मूर्खताओं का प्रमाण है, जो सामुदायिक विकास को तोड़ता है और ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ता-मरोड़ता है।” अगस्त 1947 के पहले के कुछ महीनों में अंग्रेज़ी हुकूमत की जल्दबाज़ी ने दंगों को सिर्फ़ बढ़ाया नहीं बल्कि पहले पैदा भी किया। दंगों के बीच, ब्रिटिश सरकार का, ढह चुके लॉ एंड आर्डर में बिना कोई हस्तक्षेप या मदद किये, देश छोड़ कर जाना यास्मीन खान की बात को सही साबित तो करता ही है पर एक कुटिलता भी दर्शाता है जो उन्होंने 1943 के बंगाल के अकाल के दौरान भी दिखाई, बंगाल के ही अनाज को द्वितीय विश्व युद्ध में लगी अपनी फौजों को भेज कर। बल्कि यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वह अकाल प्राकृतिक ना हो कर अंग्रेज़ों की कुटिलता का नतीजा था।

लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य के लिए जिन्ना की अलग मुल्क की मांग को मान लेना आसान क्यों था? क्योंकि आयरलैंड में अंग्रेज़ इस तरह का विभाजन पहले कर चुके थे और शायद उस सोच और तरीके से इत्तेफ़ाक़ रखते थे। पर भविष्य में यह साफ़ हुआ कि इससे ना आयरलैंड (और उत्तरी आयरलैंड) का और न हिन्दुस्तान (और पाकिस्तान) का भला हुआ। मुस्लिम लीग के नेताओं की परिकल्पना यह थी कि पाकिस्तान मुख्यतः एक मुस्लिम बाहुल्य देश होगा जिसे हिन्दुस्तान का हर मुस्लिम अपना समर्थन देगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि भारत के समस्त मुसलमानों ने इसके गठन का समर्थन नहीं किया। जनवरी 1948 में एक हिंदू राष्ट्रवादी चरमपंथी द्वारा गांधी की हत्या कर दी गई, जिसने विभाजन के समय मुसलमानों के अत्यधिक समर्थन के लिए उन्हें दोषी ठहराया था।

 

अंग्रेजों के भारत आने से पहले एक लम्बा वक़्त ऐसा भी रहा है जब संस्कृत और भारत की अन्य भाषाएं, साहित्य, कला और संगीत आने वाले आक्रमणकारियों के साथ आईं  फ़ारसी और अरबी के साथ ज़िंदा रहे, जब राजपूत राजकुमारियों ने मुग़लों से शादी की और जब मियां मीर ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की नींव रखी लेकिन ब्रिटिश शासन ने उस में पहले दरारें डालीं और फ़िर विभाजन से तोड़ दिया।

 

1947 के बाद से दोनों मुल्कों के रिश्तों में कभी ठहराव नहीं आया है, कश्मीर मसले का कोई अंत नहीं दिखता और अलग अलग युद्धों के बाद दोनों परमाणु युद्ध के संदर्भ में भी टकराव के नज़दीक आ चुके हैं। पाकिस्तान एक फेल्ड स्टेट माना जाता है जिस का सारा वजूद अब सिर्फ़ हिन्दुस्तान के ख़िलाफ़ आतंकवाद, तालिबान के समर्थन और अमेरिका और चीन की जी-हुज़ूरी के सदर्भों में सिमट कर रह गया है। पीढ़ी दर पीढ़ी जो यादें और कहानियां एक विरासत के तौर पर आगे बढ़ती जाती हैं उनमें आख़िर में अफ़साने और उनके क़िरदार ही रह जाते हैं। जैसे यहूदियों के पास होलोकॉस्ट की यादें और कहानियां हैं कुछ वैसे ही ज़ख्म हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की आज की आवाम के हैं।

क्या पाकिस्तान से हम इतना भी नहीं सीख सकते कि धर्म की कल्पना और आधार पर बने देश का कोई भविष्य नहीं होता? हिंदुस्तान को अंग्रेज़ो के पहले ज़िंदा भी धर्मनिरपेक्षता ने ही रखा और आज उसे बांट भी धार्मिक जूनून ही रहा है।

उस दौर के अहम् लेखक सादत हसन मंटो ने कहा था कि “हिन्दुस्तान आज़ाद हो गया, पाकिस्तान आज़ाद हो गया, पर दोनों मुल्कों में इंसान ग़ुलाम रह गया – पूर्वग्रह का, धार्मिक कट्टरता का, बर्बरता का और अमानवीयता का ग़ुलाम”। शायद इसीलिए उन्होंने यह भी कहा था कि “जब ग़ुलाम थे तब आज़ादी का ख़्वाब देखते थे, अब आज़ाद हैं तो कौन सा ख़्वाब देखेंगे?”