दक्षिणपंथ और दबी हुई धार्मिक व जातीय कुंठाएं!

"एक रूढ़िवादी व्यक्ति वो है जिसके पास दो स्वस्थ टांगें हैं पर फिर भी जिसने कभी आगे बढ़ना नहीं सीखा"

फ्रेंच क्रांति के दौरान एक बड़ा सवाल उठा कि क्या राजा को पूर्ण वीटो का अधिकार होना चाहिए या नहीं। जो पूर्ण वीटो के पक्ष में थे वो उस बैठक में सभापति के राइट में बैठे थे और जो सदियों की इस परंपरा में बदलाव चाहते थे वो लेफ्ट में। यहीं से राइट विंग और लेफ्ट विंग की परिभाषाएं प्रचलन में आयीं।



दक्षिण पंथ 

आम जनमानस में राइट विंग (दक्षिणपंथी) का संबंध बड़े स्तर पर मुस्लिम विरोधी सोच या राजनीति से जोड़ा जाता है। पर आज की तारीख़ में जब राइट विंग की विचारधारा विश्व के कई देशों में व्यापक है तो मैं मानता हूँ कि इसके अन्य सामाजिक पहलुओं को समझना भी ज़रूरी है, मुस्लिम विरोधी सोच राइट विंग के कई रूपों में से बस एक रूप है।

 

फ्रेंक्लिन रूज़वेल्ट ने कहा था कि “अ कंज़र्वेटिव इज़ अ मैन विद टू पर्फेक्ट्ली गुड लेग्स हु हैज़ नेवर लर्नड टू वॉक फॉरवर्ड”, अर्थात “एक रूढ़िवादी व्यक्ति वो है जिसके पास दो स्वस्थ टांगें हैं पर फिर भी जिसने कभी आगे बढ़ना नहीं सीखा।”

जिन “अन्य सामाजिक पहलुओं” के बारे में मैंने ऊपर कहा उनका तात्पर्य रूज़वेल्ट की बात में “वॉक फॉरवर्ड” से है। तो क्या हैं वह अन्य सामाजिक पहलू?


पारंपरिक तौर पर राजाओं का निर्णय अंतिम माना जाता था चाहे वह आम सहमति से अलग हो। फ्रेंच क्रांति के दौरान एक बड़ा सवाल उठा कि क्या राजा को पूर्ण वीटो का अधिकार होना चाहिए या नहीं। जो पूर्ण वीटो के पक्ष में थे वो उस बैठक में सभापति के राइट में बैठे थे और जो सदियों की इस परंपरा में बदलाव चाहते थे वो लेफ्ट में। यहीं से राइट विंग और लेफ्ट विंग की परिभाषाएं प्रचलन में आयीं।


तो मूल रूप से यह कह सकते हैं कि जो अपने शासक को किसी भी चुनौती, बदलाव से परे मानते हैं वो राइट विंगर्स (दक्षिणपंथी) और जो चलती हुई परंपराओं और ढांचों में बदलाव चाहते हैं वो लेफ्ट विंगर्स (वामपंथी) हैं। समय, देश, समाज, वहां की जनता की समानता और विभिन्नता और उनके मसलों के हिसाब से इन परिभाषाओं में आमूलचूल फेरबदल होते रहे हैं पर मोटे तौर पर तात्पर्य सबका एक ही है।

रूस में राइट और लेफ्ट की अभिव्यक्ति रूसी क्रांति में श्रमिकों के अधिकारों के सन्दर्भ में हुई और अमेरिका में बीसवीं शताब्दी में अलग अलग दशकों में अलग अलग घटनाओं में हुई – जैसे कि 30 के दशक में रूज़वेल्ट की न्यू डील, 40 और 50 के दशक में शीत युद्ध और फिर आगे के दशकों में वियतनाम युद्ध।

राइट विंग विचारधारा की और भी अभिव्यक्तियाँ हैं:

1. अति राष्ट्रवाद
2. पितृसत्ता मानसिकता जिस में महिला एक द्वितीय दर्जे की नागरिक है: विवाह, तलाक, गर्भपात, करियर, रीति-रिवाज़ इत्यादि के मसलों पर
3. समलैंगिकों के प्रति घृणा और मखौल
4. अन्य धर्मों, समुदायों और राष्ट्रों को अपने धर्म, समुदाय और राष्ट्र से नीचा समझना
5. दूसरे प्रांत या देश से आने वाले प्रवासियों से असुरक्षा की भावना के चलते उन से भेदभाव
6. अपने से अलग सोच रखने वाले और उसकी सोच के प्रति असहिष्णुता
7. तथ्यों और वैज्ञानिक तर्क का अभाव और उन से इंकार और कांस्पीरेसी थ्योरीज़ पर अधिक विश्वास: Covid-19 की वेक्सिनेशन और 5Gटेक्नोलॉजी का विरोध
8. जातीय, धार्मिक, सांस्कृतिक और नस्लीय रूप से समानता पर ज़ोर (जातीय और नस्लीय अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वग्रह): जैसे कि हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना
9. पूंजीवाद और निजीकरण पर ज़ोर

उपरोक्त सभी उदाहरणों में एक क़िस्म की जड़ता, असहिष्णुता और अज्ञानता है – यह सभी अभिव्यक्तियाँ व्यक्ति और समाज को आगे बढ़ने से रोकती हैं और यहीं पर रूज़वेल्ट के “वॉक फॉरवर्ड” का भाव सही मायनों में समझ में आना शुरू होता है।

 

इन जड़ताओं और असहिष्णुताओं के परिणाम घातक हैं। अति राष्ट्रवाद के चलते हमें सरकार की ख़ामियां और विफलतायें पहले तो दिखती नहीं, और दिख भी जायें तो हमारा दंभ उन्हें स्वीकारने नहीं देता। वर्ना कोविड की दूसरी लहर में हुई मौतें, हाथरस, उन्नाव और बुलंदशहर के बलात्कार और हत्याकांड और लखीमपुर में हुई किसानों की हत्या के बाद भी उत्तर प्रदेश में भाजपा की दोबारा जीत संभव नहीं थी।

 

 

अमेरिका एक विकसित लोकतंत्र है जिसकी वजह से वहां की जनता को ट्रम्प को चुनने की अपनी ग़लती का एहसास हुआ और वो ग़लती उन्होंने 2020 में नहीं दोहरायी। भारत लोकतंत्र की शैशवावस्था में 2019 और 2022 में यह ग़लती दो बार दोहरा चुका है और विडंबना यह है कि शिकार को यह एहसास ही नहीं है कि वह शिकार बन चुका है। क्योंकि अति राष्ट्रवाद और जातीय, धार्मिक, सांस्कृतिक और नस्लीय रूप से समानता पर ज़ोर इतना अधिक है कि सरकार को डिफ़ॉल्ट रूप से किसी भी कमी, विफ़लता और चुनौती से परे मान लिया गया है।

 

 

भारत और अमेरिका के अलावा राइट विंग के बढ़ते प्रकोप के शिकार विश्व के क़रीब 30-35 देश जैसे कि ब्राज़ील, पोलैंड, इटली, जर्मनी, जापान और थाईलैंड जैसे और देश भी हैं। हर देश में इसका असर और काम करने का तरीक़ा अलग हो सकता है पर परिणाम लगभग एक जैसे ही हैं – सामाजिक और व्यक्तिगत अस्थिरता और असमानता।


2020 के चुनावों में ट्रम्प की हार से बौखलाए समर्थकों का कैपिटल बिल्डिंग पर हमला, ब्राज़ील में बोल्सोनारो द्वारा कोविड महामारी का कुप्रबंध और गिरती अर्थव्यवस्था, थाईलैंड में लोकतंत्र पर आया राजनीतिक संकट, पोलैंड में घटती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों के बीच बढ़ती खाई — यह सब भी राइट विंग के दुष्परिणाम हैं।


राइट विंग के पनपने के मुख्य कारणों में ही उसका समाधान भी हैं। अति राष्ट्रवाद का मेलोड्रामा, नस्लीय प्रभुत्व का मिराज, पारंपरिक मीडिया का ढहना और अनियंत्रित सोशल मीडिया का फैलाव, युवकों के पास शिक्षा, रोज़गार और अवसरों का अभाव और सदियों से दबी हुई धार्मिक और जातीय कुंठाएं – यह सब दक्षिणपंथ की मौजूदा लहर के मुख्य कारक हैं और इनका उन्मूलन ही उन से उपजी अस्थिरता और असमानता का निवारण है।

सवाल सिर्फ़ नीयत और प्राथमिकता का है।