प्रेम वह नहीं जो केवल पाने की इच्छा करे, प्रेम वह है जो केवल देने में विश्वास रखे। जब प्रेम में अपेक्षाएँ जुड़ जाती हैं, तो वह प्रेम नहीं रहता, बल्कि एक व्यापार बन जाता है। सच्चा प्रेम निःस्वार्थ होता है। यदि हम प्रेम में त्याग करना सीख जाएं, तो हमारे जीवन में कोई दुःख नहीं रहेगा। प्रेम हमें केवल आनंद ही नहीं देता, बल्कि हमें हमारी कमजोरियों को भी दिखाता है। जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो हमें अपने भीतर छिपी स्वार्थपरता का भी एहसास होता है। प्रेम हमें सिखाता है कि हमें केवल अपने सुख की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि हमें अपने प्रियजनों के सुख के लिए भी समर्पित होना चाहिए।
भगवान के प्रति प्रेम ही सबसे ऊँचा प्रेम है। यह प्रेम हमें हर जीव में भगवान को देखने की शक्ति देता है। यदि हम प्रत्येक मनुष्य को भगवान का अंश मान लें, तो हम कभी किसी से घृणा नहीं कर सकते। प्रेम हमें जोड़ता है, प्रेम हमें ऊँचा उठाता है, और प्रेम हमें हमारी सच्ची प्रकृति का बोध कराता है।
अहिंसा प्रेम की ही अभिव्यक्ति है। यदि हमारे भीतर प्रेम होगा, तो हम किसी को चोट नहीं पहुँचा सकते। यदि हम प्रेम को पूरी तरह अपने जीवन में उतार लें, तो हमें किसी नियम, किसी कानून की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि प्रेम अपने आप में सबसे बड़ा कानून है। इसलिए, यदि हम अपने जीवन को सुखी और शांतिपूर्ण बनाना चाहते हैं, तो हमें प्रेम को अपनाना होगा। प्रेम से बढ़कर कोई शक्ति नहीं है। प्रेम वह अमृत है, जो सभी कटुता और द्वेष को समाप्त कर सकता है। प्रेम ही हमें ईश्वर के निकट लाता है, और प्रेम ही हमें हमारी आत्मा से परिचित कराता है।
यंग इंडिया, 12 जून 1928
