लाखों कोविड मौतें: उदासीन, निष्क्रिय और अकुशल नेतृत्व का परिणाम?

कोविड महामारी के हर भयावह सच को सरकार, उनके नुमाइंदों और समर्थकों द्वारा हर मोर्चे पर झुठलाया गया। क्या अब WHO समेत तमाम संगठनों के द्वारा दिए मौत के आंकड़ों को झुठलाने की बारी है?

अन्य विश्व की तरह भारत में भी वैक्सीन के लिए प्रयास जारी थे। संक्रमण के मामलों में कुछ महीनों के पश्चात गिरावट आई पर वह सरकार के प्रयासों से नहीं बल्कि हर्ड इम्युनिटी से था। सरकार का ध्यान हमेशा की तरह कुछ ना करने और चुनावों पर केंद्रित रहा।



 

कुछ दिन पहले 2021 अप्रैल की एक तस्वीर पर नज़र पड़ी जिसमें 2 छोटे बच्चे अपने पिता की अर्थी को कंधा देते, बिलखते हुए अंतिम संस्कार के लिए जा रहे थे उस मौत को देख कर दुःख तो हुआ ही पर उससे भी भयावह वह ख़्याल था कि उन बच्चों के मन में किस क़दर दर्दनाक स्मृतियां जीवन भर के लिए रह जायेंगी। कहते हैं बच्चों की अर्थी उठाना माता-पिताओं के जीवन का सबसे भारी बोझ होता है पर बच्चों के लिए अपने माता पिता की अर्थी का बोझ का भार क्या कम होता होगा? वह भी तब, जब उन पलों का बोझ भी जीवन भर साथ चलना है?

यह सही है कि पिछले क़रीब 100 वर्षों में ऐसी आपदा विश्व में कभी नहीं आई और यह एक बड़ा कारण रहा वैश्विक स्तर पर हुई मौतों और नुक्सानों का। लेकिन हमारे सामने ऐसे कुछ उदाहरण हैं जिन्हें देख कर मेरा यह दृढ़तापूर्वक विश्वास है कि सब कुछ देश के नेतृत्व और उसकी नीयत पर निर्भर करता है। और भारत के संदर्भ में यह समझना बेहद आसान है कि पहली और दूसरी, कोविड की दोनों लहरों के शुरू होने के पहले मोदी सरकार के पास पर्याप्त समय और संसाधन थे पर नीयत नहीं।


मुझे अच्छी तरह याद है कि भारत में कोविड का पहला मामला 30 जनवरी 2020 में केरल में दर्ज हुआ था पर उस से पहले बाक़ी कुछ देशों में फैलना शुरू हो चुका था। फ़िर 1.5 महीने पश्चात 22/23 मार्च को बिना किसी तैयारी के अचानक पहला लॉकडाउन घोषित हुआ। उन 1.5 महीनों में कोई भी दूरदर्शी और जिम्मेदार नेतृत्व आपदा प्रबंधन की तैयारी कर सकता था। लेकिन इसके बजाय, सरकार ने फ़रेब का सहारा लेना बेहतर समझा।


फ़रेब का पहला तीर 22 मार्च 2020 को चला “जनता कर्फ्यू” के नाम का। उसके 2 मुख्य बिंदु थे:

1. 14 घंटों में वायरस स्वतः ही ख़त्म हो जायेगा।

2. कर्फ्यू के अंत में स्वास्थ्य और सुरक्षा कर्मियों का मनोबल बढ़ाने के लिए ताली और थाली बजाई जाएंगी।

वायरस स्वतः तो ख़त्म नहीं हुआ पर ताली और थाली बजाने के नाम पर सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुए जुलूस तक निकले।

यह बहुत स्वाभाविक सी बात है कि यह आवश्यक नहीं कि एक शासक के पास हर तरह की शैक्षिक और प्रशासनिक योग्यता और दक्षता हो, इसीलिए हर सरकार के पास आपदा प्रबंधन का अपना विभाग होता है जो देश के अंदर और बाहर चल रहे हालातों के मद्देनज़र एक संभव आपदा से निपटने की तैयारी करने में सरकार की सहायता कर सके।


भारत में वह विभाग है National Disaster Management Authority (राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण) जिसका मुखिया देश का प्रधानमंत्री होता है। यह विभाग 2005 में मनमोहन सिंह की सरकार ने शुरू किया था (70 साल ?) जिसका काम होता है प्राकृतिक या मानवीय आपदाओं के आने से पहले उनका आंकलन और आ जाने पर उनसे लड़ने के लिये क्षमता-निर्माण करना।


क्या उन 1.5 महीनों में NDMA से सलाह-मशविरा लिया गया था?

जो उन 1.5 महीनों में किया जा सकता था वह था:

1. एयरपोर्ट्स को बंद करना – क्योंकि वह सबसे मुख्य ज़रिये थे अंतर्राष्ट्रीय आवागमन के – ना सिर्फ़ यात्रियों के बल्कि उनके ज़रिये वायरस के भी
2. अस्पतालों के बेड्स की संख्या में युद्ध स्तर पर इजाफ़ा
3. भारत की संपूर्ण जनसंख्या के लिए ना सही पर जितना हो सके उतना ऑक्सीजन, मूल दवाइयां, उपकरणों, एम्बुलेंस इत्यादि की व्यवस्था

पर हमारे प्रधानसेवक जी ने राष्ट्रीय टीवी पर कुछ अन्य बातों को वरीयता देना ज्यादा जरूरी समझा।अप्रैल 2020 में कोविड से लड़ने की यह तैयारी और रणनीति सुझाई:

1. बुजुर्गों और जरूरतमंदों का ख्याल रखें
2. सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें
3. इम्युनिटी बढ़ाने के लिए आयुष मंत्रालय के सुझावों का पालन करें
4. आरोग्य सेतु ऐप डाउनलोड करें
5. लोगों को नौकरी से न निकालें
6. COVID-19 सेनानियों का सम्मान करें

इन 6 रामबाणों में से वह कौन सा बाण था जो किसी को कोविड इंफेक्शन हो जाने और समाज में उसके फैल जाने पर काम आता? यह सवाल क्या हम ने, मीडिया ने, विपक्ष ने और अदालतों ने सरकार से पूछा? और उस पर तुर्रा सरकार का वह दावा कि “हम ने काफ़ी ज़िंदगियां बचा ली हैं”। इशारा साफ़ था – अपनी व्यवस्था और सुरक्षा स्वयं कर लें।

उन्हीं दिनों 2 और घटनायें हुईं –

1. कोविड महामारी के विरुद्ध दिया जला कर भारत की एकजुटता की घोषणा – यह एक और फरेब मात्र था।

2. तबलीग़ी ज़मात प्रकरण के ज़रिये जनता का ध्यान सरकार की तैयारी और जवाबदेही से हटा कर सांप्रदायिकता पर ले जाना।

पर, इन सबके बीच महामारी से निपटने की असल तैयारी अभी तक नदारद थी। बिना किसी तैयारी के अंतहीन लॉकडाउन का सिलसिला चलता रहा। इस बीच करोड़ों लोगों को जान, माल, स्वास्थ्य, रोज़गार, शिक्षा, मानसिक तनाव – हर संभव नुकसान हुआ। अन्य विश्व की तरह भारत में भी वैक्सीन के लिए प्रयास जारी थे। संक्रमण के मामलों में कुछ महीनों के पश्चात गिरावट आई पर वह सरकार के प्रयासों से नहीं बल्कि हर्ड इम्युनिटी से था। सरकार का ध्यान हमेशा की तरह कुछ ना करने और चुनावों पर केंद्रित रहा।

पर असली भयावहता और निर्ममता हुई मार्च 2021 में दूसरी लहर की शुरुआत से । उसके थोड़ा ही पहले भारत में वैक्सीन बन चुकी थी पर मुखिया नेतृत्व ने वैक्सीन कूटनीति के नाम पर करोड़ो खुराकें अपने देशवासियों के लिए सुनिश्चित करने की बजाय अन्य कुछ देशों को भेजीं। आपने हवाई यात्रा प्रारंभ होने के पहले देखा होगा की आपातकाल के समय पहले स्वयं को उसके बाद ही बाकियों को सुरक्षित करने की सलाह और निर्देश होते हैं। मुझे विश्वास है हमारे प्रधानमंत्री जी की असंख्य हवाई यात्राओं में उन्होंने भी ऐसे निर्देश देखे और सुने होंगे। वैक्सीन कूटनीति में वह समझदारी कहीं थी?

नतीजतन दूसरी लहर में जब संक्रमण के प्रतिदिन की मौतें 4 हज़ार और मामले 4 लाख पार हो चुके थे तब हम अपनी ही बनाई वैक्सीन को पाने के लिए जूझ रहे थे। संघर्ष सिर्फ़ वैक्सीन का नहीं पर ऑक्सीजन बेड, ऑक्सीजन सिलिंडर, वेंटीलेटर, एम्बुलेंस, मूल दवाइयां, रेमडेसिविर इंजेक्शन और यहां तक कि अंतिम क्रिया के लिए श्मशानों और दफ़न करने के लिए कब्रिस्तानों में जगह के लिए भी था। उसके लिए भी घंटों की इंतज़ारी थी। अपने प्रियजन के शव के साथ घंटों इंतज़ार करना – क्या इस में सरकार और सिस्टम की कहीं भी और कोई भी जवाबदेही नहीं है?

2020 में तब्लीग़ी ज़मात प्रकरण “अगर” मामले बढ़ा रहा था तो 2021 की दूसरी लहर के चरम में कुंभ का आयोजन नहीं?

मुद्दा सिर्फ़ तैयारी का नहीं था। इतनी मौतों के बाद भी सरकार के रवैये का भी था। उस वक़्त आलम यह था कि बकौल रायटर्स, कोविड का विश्व का हर छठा मामला भारत से था। ऐसे में सरकार के रवैय्यों की कुछ झलकियां –
1. उत्तर प्रदेश सरकार ने प्राइवेट लैब्स द्वारा टेस्टिंग तक बंद कर दी थी – जिस से असली आंकड़े सामने नहीं आए और यह कहा गया कि मामले घट रहे हैं।

2. देश की सर्वोच्च संस्था संसद में यह कहा गया कि राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा ऑक्सीजन की कमी के कारण कोई मौत की सूचना नहीं दी गई है।

3. केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आरोप प्रत्यारोप का खेल

4. Serum Institute के मुखिया का यह कहना है कि मांग को पूरा करने के लिए मौजूदा उत्पादन क्षमता “बहुत तनावपूर्ण” है।

5. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन का कहना कि “कोविड टीकों की कोई कमी नहीं”

6. केंद्र सरकार का कहना कि हमने कोविड पर विजय पा ली है।

उपरोक्त सभी बातों में विरोधाभास साफ़ दिखता है। सरकार के मुखिया से ले कर सबसे निचले स्तर के नुमाइंदों तक जवाबदेही ग़ायब थी।

 

दूसरी लहर के चरम के दौरान, प्रधानमंत्री बंगाल में चुनाव प्रचार में व्यस्त थे, यह कहते हुए कि “मैं जहां देखता हूँ मुझे लोग ही लोग नज़र आ रहे हैं”। वह असंवेदनशील बयान देने से पहले, उनके पास व्यवस्था करने के लिए पूरे 1 साल (पहली लहर के बाद और दूसरी लहर शुरू होने से पहले) का वक़्त था, बल्कि पहली लहर से सबक लेते हुए तैयारी करने का सरकार के पास वह दूसरा मौका था जब हमारे पास समय और प्रारंभ में वैक्सीन – दोनों थे।

 

पर कुछ नहीं किया गया।कोविड के मामले, जो पहले सिर्फ संख्या थे, अब मित्रों/रिश्तेदारों के नाम में परिवर्तित हो रहे थे। इन सबके पश्चात, प्रधानमंत्री द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के कोविड संबंधित प्रबंधों की पुरजोर प्रशंसा करना नैतिकता को हर तरह से शर्मसार कर देता है विशेषतः तब, जब समूचे विश्व ने गंगा में तैरते शवों और गंगा के किनारे चिताओं को देखा।

एक बहुत आम धारणा बनी कि इस महामारी में जब विकसित देश धाराशाई हो गए तो विकासशील देश क्यों नहीं होते। मेरी राय में यह एक ग़लत अवधारणा है।


अमेरिका, जो कि एक विकसित देश है, में भी हालात कुछ ऐसे ही थे। डोनाल्ड ट्रम्प की महामारी से निपटने में निष्क्रियता, अपने भाषणों में मास्क का मज़ाक उड़ाना ऐसे ही कुछ कारण थे विश्व में सर्वाधिक मामलों में अमेरिका का सबसे आगे रहने का। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भी अपनी अदूरदर्शिता और निष्क्रियता के द्वारा देश की लाखों मौतों के कारण बने। ऐसे विकसित देशों की क़तार में इटली, स्पेन और फ्रांस भी रहे पर वहां कारण नेतृत्व के सिवा कुछ और भी थे।


इनके उलट कुछ विकासशील देशों में हम साफ़ देख सकते हैं कि किस तरह सिर्फ़ अपने नेतृत्व के बल पर वह इस महामारी से निपटने में विकसित देशों के मुकाबले अधिक सफल रहे – जैसे साउथ कोरिया, रवांडा और वियतनाम। मुख्य तौर पर 4 चरणों(stages)

(i) Risk Identification (ii) Containment (iii) Treatment (iv) Post-Treatment Measures
(i) ख़तरे की पहचान (ii) रोकथाम (iii) उपचार और (iv) उपचार के बाद उपाय

और 3 निर्धारकों (Determinants):

(i) Healthcare System, (ii) Social Protection System and (iii) Overall Governance System
(i) स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था, (ii) सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था और (iii) कुल शासन व्यवस्था

के द्वारा हम इनके कुशल प्रबंधन को बेहतर समझ पाएंगे।

ख़तरे की पहचान और प्रारंभिक रोकथाम –

साउथ कोरिया, रवांडा और वियतनाम ने चीन के कदम उठाने से पहले ही अंतरराष्ट्रीय यात्राएं बंद कर दी।

रोकथाम-

साउथ कोरिया और वियतनाम – ट्रेसिंग, क्वारंटाइनिंग की तैयारी, सरकार-स्वास्थ्य कर्मियों-जनता के बीच दिन में दो बारब्रीफिंग, नि: शुल्क बड़े पैमाने पर टेस्टिंग, क्वारंटाइन हुए लोगों के लिए वैतनिक अवकाश

रवांडा – वक़्त से पहले – लॉकडाउन लगाना, समस्त राष्ट्रीय संस्थानों के बीच सामंजस्य स्थापित करना, standard operating procedures और दिशानिर्देश लागू करना, फंड्स का प्रबंधन करना, प्राथमिक उपचार केंद्र को अंतिम रूप देना और वैज्ञानिकों की एक सलाहकार टीम के समर्थन से एक cross-sector National Joint Task Force की स्थापना करना। पहला मामला सामने आने से पहले ही देश में मुफ्त 24/7 COVID टेस्टिंग की पेशकश करना।

उपचार-

साउथ कोरिया और रवांडा- टेस्टिंग, क्वारंटाइन और संपूर्ण चिकित्सा और देखभाल (घर और अस्पताल) के खर्चों का सरकारी कवरेज सुनिश्चित करना, इलाज के दौरान और बाद में लोगों के काम और आय की सुरक्षा पर भी ध्यान देना, सरकार की तरफ़ से पीड़ितों की तनख़्वाह सुनिश्चित करना, नौकरी खो देने वालों को जीवन व्यय भी प्रदान करना।

वियतनाम – साउथ कोरिया और रवांडा के समान क़दमों के अलावा दवाइयों, वेन्टिलेटर और मास्क का उत्पादन हज़ारों और लाखों की संख्या में बढ़ाना और लाखों टेस्टिंग किट्स का साउथ कोरिया से आयात करना

उपचार के बाद उपाय –

तीनों देशों में सिलसिलेवार तरीक़ों से लॉकडाउन को हटाना, टेस्टिंग और क्वारंटाइन में ढील ना करना, चरणों में अंतरराष्ट्रीय यात्राएं फिर से शुरू करना, स्वास्थ्य निर्देशों (मास्क, सोशल डिस्टैन्सिंग, सेल्फ-क्वारंटाइन आदि) का बने रहना, आंकड़ों का नियमित संग्रह करते रहना

इन उपायों और प्रयासों से हम साफ़ समझ सकते हैं कि महामारी के जान और माल के नुक्सान को कम से कम रखने में सबसे महत्वपूर्ण रहा समय से पहले क़दम उठाना – Being pro-active.

 

महामारी का प्रबंधन देश के विकसित और विकासशील होने से कम और उन देशों के नेतृत्व की नीयत से ज़्यादा जुड़ा मामला है। अमीर और ग़रीब देशों के पास संसाधन (धन, लोग, अस्पताल, उपकरण इत्यादि) कम या ज़्यादा हो सकते हैं पर उनका उपयोग उनकी मात्रा पर नहीं उनके मालिक की सूझ बूझ पर निर्भर करता है। वरना 1971 में लोंगेवाला की लड़ाई में भारत के 120 सैनिक पाकिस्तान के 2000-3000 सैनिक और 40 टैंकों के सामने कैसे टिकते?

 

समूचे विश्व में कोविड एक प्राकृतिक आपदा के तौर पर शुरू हुई पर भारत (और अमेरिका जैसे कुछ देशों) में शुरू होने के बाद यह नेतृत्व द्वारा जान बूझ कर दिखाई उदासीनता और निष्क्रियता की विशाल मिसाल बन कर रह गई। व्यक्तिगत रूप से मैं इसे किसी नरसंहार से कम नहीं मानता।

यह वक़्त ही बतायेगा कि कितनी मौतें भाजपा समर्थकों को यह समझा पाएंगीं कि मौजूदा हालात के लिए सिर्फ मौजूदा शासक को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, किसी और को नहीं। समुदाय विशेष के प्रति नफरत ने हमें यहां तक ला खड़ा किया है कि हमारे आसपास हर समुदाय का सदस्य मरा और आज हम उन सब के हत्यारों को पूरे जोश से समर्थन दे रहे हैं।

महामारी के हर भयावह सच को सरकार, उनके नुमाइंदों और समर्थकों ने हर मोर्चे पर झुठलाया। मेरी नज़र में वह झुठलाना कोविड मृतकों का सर्वोच्च असम्मान था।

सतनाम सिंह

(यह लेखक के निजी विचार हैं)