फ़ैसला आपका है, इतिहास से धार्मिक वैमनस्य सीखें या आपसी प्रेम?

विभाजन की सहमति में जब देश का हर समुदाय शामिल था और विभाजन के पीड़ित भी हर समुदाय से थे तो उसके दाग के छींटे भी सभी पर समान रूप से पड़ने चाहिए।

देश किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं था और बंटवारे की लाइन “रैडक्लिफ़ लाइन” पर समझौते पर कांग्रेस की ओर से नेहरू और अबुल कलाम आजाद, मुस्लिम लीग का प्रतिनिधित्व करने वाले जिन्ना, दलितों की ओर से अंबेडकर, और सिखों की ओर से मास्टर तारा सिंह – इन सबकी ससहमति थी। तो विभाजन की सहमति में अगर हर समुदाय शामिल था तो विभाजन के पीड़ित भी हर समुदाय से थे। उसके दाग के छींटे सब पर समान रूप से पड़े।



दक्षिणपंथ (राइट विंग) से घोर असहमत एक सिख होने के नाते अपने जीवन में मैंने अपने लिए एक दिलचस्प तोहमत कुछ एक बार सुनी है। वो यूं कि “तुम सच्चे सरदार नहीं हो, होते तो मुसलमानों का बचाव करके अपने गुरुओं की कुर्बानियों को व्यर्थ नहीं जाने देते।

यह एक ऐसा वाक्य है जिस से इसे कहने वाले को सिख-मुस्लिम के परस्पर इतिहास की समझ कितनी क्षीण है वो साफ़ दिखता है।

सिख धर्म औपचारिक तौर पर तो गुरु गोबिंद सिंह के द्वारा सन् 1699 में एक धर्म बना। पर उस से पहले यह सिर्फ एक सोच थी, विचारधारा थी जिसकी शुरुआत गुरु नानक से 230 वर्ष पहले सन् 1469 में हो चुकी थी। इस विचारधारा में गुरु नानक और उनके बाद के सभी गुरुओं ने व्यावहारिक और ईमानदार जीवन जीने, ईश्वर के साथ एकता स्थापित करने, संपूर्ण मानव जाति की बिना किसी भी भेदभाव के निःस्वार्थ सेवा करने, एक संत की तरह जीने, और फिर भी एक सिपाही की तरह न्याय के लिए लड़ने और दुनिया के तमाम अंधविश्वासों, पुनर्जन्म , कुरीतियों, पाखंडों और अव्यावहारिक कर्मकांडों से पार पाने पर ज़ोर दिया।

सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक का जन्म 1469 में ननकाना साहिब में हुआ था जो आज पाकिस्तान में है। भारत का तत्कालीन शासक तब बहलोल खान लोदी था।

 

अपने लड़कपन के वर्ष में नानक ने अपने मुसलमान मित्र मरदाना के साथ धर्म और आध्यात्मिक मुद्दों पर तपस्वियों और ज्ञानियों से परस्पर संवाद करते हुए बिताये; और एक दिन एक घोषणा की, कि “कोई हिंदू नहीं है, कोई मुसलमान नहीं है” उसके पश्चात उन्होंने अपने विचारों को समाज के समक्ष रखना शुरू किया।

 

इस सिलसिले में उन्होंने 5 प्रमुख यात्राएं कीं, बंगाल और असम से दक्षिण भारत, फिर वहां से कश्मीर, लद्दाख और तिब्बत होते हुए बगदाद और वहां से वह यात्रा रावी नदी के तट पर समाप्त हुई। उनकी इन यात्राओं के दौरान उनके अनुयायी सभी बने – हिंदू, मुस्लिम – और उनके विचारों, यात्राओं से अर्जित अनुभव और ज्ञान से शिक्षा (सिख्या) लेते हुए फिर वो ही अनुयायी “सिख” कहलाए गए।

तीसरे गुरु, गुरु अमर दास के समय बादशाह अकबर ने गोइंदवाल साहिब शहर में अपने जीवन में पहली बार गुरु नानक द्वारा शुरू लंगर प्रथा को देखा और ख़ासा प्रभावित हुआ। गुरु के दामाद और चौथे गुरु, गुरु राम दास ने फिर आगे चल कर अमृतसर की स्थापना की। उसी अमृतसर में गुरु राम दास के बेटे और पांचवे गुरु, गुरु अर्जन ने स्वर्ण मंदिर की स्थापना की जिसकी नींव मुस्लिम सूफी संत मियां मीर ने गुरु जी के निमंत्रण पर रखी।

 

छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब ने अपने शहर में मुसलमानों के लिए एक मस्जिद की स्थापना की, जिनके पास इबादत करने के लिए कोई और जगह नहीं थी। “गुरु की मसीत” (गुरु की मस्जिद) नाम से वह मस्जिद गुरदासपुर (पंजाब) में आज भी खड़ी है।

 

 

इन सब उदहारणों के अलावा सिख धर्म अपने प्रारंभिक और मध्य दौर में भक्ति काल से भी काफ़ी प्रभावित था। उस दौर के कई मुसलमान फ़क़ीर, पीर और सूफ़ी जैसे बाबा फ़रीद, भगत भीखन, भगत सधना (और अगर संत कबीर को मुसलमान मानें तो वह भी) के वचनों को गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित किया गया। सिखों के धार्मिक शास्त्रों, व्याख्याओं और प्रार्थनाओं में मुख्य रूप से कहे जाने वाले शब्द “हुकुम” भी मूल रूप से एक अरबी शब्द और एक इस्लामी अवधारणा है। “रबाब” नामक संगीत यंत्र को पुश्तों से बजाने वाले ऐसे कई रबाबी रहे हैं जिन्होंने कई सिख गुरुओं की सेवा में वक़्त बिताया है। दसवें गुरु के पश्चात प्रसिद्द सूफ़ी संत बुल्ले शाह पर भी सिख विचारधारा और भाषा का गहरा प्रभाव रहा है।


पर, जैसे 2 भाइयों या 2 मित्रों में वक़्त हमेशा एक सा नहीं रहता वैसे ही इस्लाम और सिख धर्म के परस्पर भी रचनात्मक और सामाजिक प्रभाव और संघर्ष का इतिहास दोनों रहा है।


गुरु अर्जन वह पहले सिख गुरु थे जो मुग़ल काल में शहीद हुए। हालांकि उनकी शहादत को ले कर सिखों और मुग़लों के ऐतिहासिक दस्तावेज़ परस्पर विरोधी कहानियां कहते हैं पर वह फैसला मैं इतिहास के शोधकारों पर छोड़ता हूँ। वह संघर्ष वहां से शुरू हो कर फ़िर अंत तक गुरु तेग बहादुर और गुरु गोबिंद सिंह तक और उनके बाद भी चला। जहांगीर, शाहजहां और औरंगज़ेब की निर्ममतायें सिख इतिहास और वर्तमान के वर्णनों में प्रमुख स्थान रखती है।

पर संघर्ष के पहले या संघर्ष के बाद की कोई भी घटना, किसी भी सिख गुरु के आदेश या फिर किसी भी सिख शास्त्र की व्याख्या में वह संघर्ष मुसलमानों के धर्म के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि तत्कालीन शासकों के ख़िलाफ़ था। लड़ाई धार्मिक वर्चस्व की नहीं बल्कि सिख विचारधारा के तहत न्याय के लिए थी।

 

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान का दर्द सहने वाले सबसे बड़े 2 प्रदेश बने बंगाल और पंजाब। दोनों तरफ़ से नृशंस हत्याएं हुईं – मुसलमानों ने हिन्दुओं, सिखों और ईसाईयों को मारा और हिन्दुओं, सिखों और ईसाईयों ने मुसलमानों को नहीं बख़्शा पर विभाजन का वह पूरा दौर धार्मिक लड़ाई नहीं था बल्कि एक त्रासदी थी, एक जूनून था जो गुज़र गया जिस में बच्चे, बूढ़े, जवान, औरत, मर्द हर धर्म के मरे, हर धर्म के हाथों।

 

देश किसी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं था और बंटवारे की लाइन “रैडक्लिफ़ लाइन” पर समझौते पर कांग्रेस की ओर से नेहरू और अबुल कलाम आजाद, मुस्लिम लीग का प्रतिनिधित्व करने वाले जिन्ना, दलितों की ओर से अंबेडकर, और सिखों की ओर से मास्टर तारा सिंह – इन सबकी ससहमति थी। तो विभाजन की सहमति में अगर हर समुदाय शामिल था तो विभाजन के पीड़ित भी हर समुदाय से थे। उसके दाग के छींटे सब पर समान रूप से पड़े।

1984 के सिख क़त्लेआम में मुस्लिम नहीं थे।

नानक और सूफी संत बुड्ढन शाह के परस्पर सम्मान और स्वीकार्यता की एक शानदार मिसाल हमें पंजाब-हिमाचल सीमा के पास एक मस्जिद में दिखती है जिसके गुम्बद पर चांद-तारा (मुस्लिम-प्रतीक) और खंडा (सिख चिन्ह) एक साथ हैं और जिसकी दीवारों पर नंबर 786, बाबा नानक, गुरमुखी लिपि और मक्का की साझा तस्वीरें हैं।

तो आज अगर गुरु तेग बहादुर की जयंती पर भाजपा लाल किले पर झंडा फहरा रही है तो वह सिर्फ़ एक जनसंपर्क अभ्यास है, तुष्टिकरण और रिझाने की एक शर्मनाक कोशिश। जैसा कि मैंने कहा, 2 भाई हों, 2 परिवार हों, 2 देश हों, 2 धर्म हों – उतार और चढ़ाव आना इंसानी फ़ितरत है, आते रहे हैं और आते रहेंगे।

यह संदेश और यह गुज़ारिश मेरी तरफ़ से सिखों को भी है कि एक आम सिख परिवार से आते हुए मज़हबी रंग में सराबोर तमाम किस्से मुझे भी सुनाये, बताये गए, जिन में धार्मिक वैमनस्यता मुखर थी पर यह मेरी कोशिश और मेरा फैसला था कि मुझे उन में नहीं धंसना है। चुनाव और फैसला आपको करना है कि ज़हन में किसे रखना है – बीते हुए अच्छे वक़्त को या अपनी मज़हबी बेचैनियों को।

 

 

सतनाम सिंह

(यह लेखक के निजी विचार हैं)