“बुनियादी तौर पर एकता कोई आदर्श नहीं है। सहिष्णुता भी कोई आदर्श नहीं है। ये तो आज के भारत की, बल्कि मैं कहूँगी कि आज के विश्व की व्यावहारिक अनिवार्यताएं हैं। भारत में, अनेक सम्प्रदाय हैं, अनेक धर्म हैं, अनेक जातियां हैं।
इतिहासकार अशोक कुमार पांडे द्वारा ऐसे 10 सवालों के जवाब दिए गए जिससे कश्मीर और कश्मीरी पंडितों को लेकर आपके संशय दूर करने में मदद मिलेगी। कश्मीर और कश्मीरी पंडितों को लेकर पिछले एक हजार साल के इतिहास के पन्नों को जानने
आज़ादी के 70 सालों के बाद भी यहाँ रोजगार के नाम पर खेती के अलावा कुछ खास नहीं है। पक्ष और पार्टी से परे बेरोजगारी हर राज्य की समस्या है। एक भी भर्ती या बहाली ऐसी नहीं जो संदेह या कोर्ट के
देश में बेरोज़गारी की विकराल होती समस्या और सोती हुई राज्य व केंद्र सरकारों के ख़िलाफ़ आम आवाज़ें बुलंद हो रही हैं। कोई रोकर, कोई चीखकर तो कोई लगभग गाली देने की भाषा में सरकारों को कोस रहा है। मंदिर- मस्जिद समेत
“टूटे हुए सपनों का इलाज किसी अस्पताल में नहीं होता। कोई मेडिकल इन्श्योरेंस या आयुष्मान योजना इसकी भरपाई नहीं कर सकती।” “स्कूल और कॉलेज में 16 से 18 अनमोल साल गुजारने के बाद भी बच्चों को रोजगार के लिए तरसना पड़े
रिकॉर्ड दीयों की संख्या का तो बन रहा है पर मानव विकास सूचकांक (Human Development Index) जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक सूचकांकों में हम नीचे गिरते जा रहे हैं! इंसान को समाज में गरिमा से जीने के लिए क्या चाहिए? मतदाताओं की प्राथमिकताओं में
द पैराग्राफ़/The Paragrapgh भगत सिंह के सहयोग से बनाई गयी ‘नौजवान भारत सभा’ के छह नियमों में से(जिन्हें भगत सिंह ने ही तैयार किया था) दो इस तरह थे 1) ऐसी किसी भी संस्था, संगठन या पार्टी से किसी तरह का
लोकतान्त्रिक समाज क्या है और संविधान बनाते समय संविधान निर्माताओं ने किन मूल्यों और आदर्शों को संविधान और लोकतंत्र की नींव माना था, यह बात भारत के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू, पहले उपराष्ट्रपति और ‘दार्शनिक राजा’ के नाम से विख्यात सर्वपल्ली
वेदों को लेकर जवाहर लाल नेहरू का मानना था कि – “बहुत से हिंदू वेदों को श्रुति ग्रंथ मानते हैं । खास तौर पर एक दुर्भाग्य की बात मालूम पड़ती है , क्योंकि इस तरह हम उनके सच्चे महत्व को खो बैठते